सब कुछ खो बैठे केपी ओली, मगर घमंड बरकरार
चुनाव के बाद पहली बार सार्वजनिक कार्यक्रम में पहुंचे नेकपा एमाले अध्यक्ष केपी शर्मा ओली का तेवर बदला हुआ नहीं दिखा। झापा होते हुए इलाम पहुंचे ओली ने नई सरकार पर हमला बोला, लेकिन बात यहीं नहीं रुकी। उन्होंने अपनी ही पार्टी के भीतर नेतृत्व पर सवाल उठाने वालों को ‘आवारा’ तक कह दिया।
यही बयान अब एमाले के भीतर नई बेचैनी की वजह बन गया है। चुनावी हार के बाद पार्टी में नेतृत्व और भविष्य की दिशा पर पहले से सवाल उठ रहे थे। ऐसे समय में ओली का अपने ही नेताओं और कार्यकर्ताओं पर इस तरह बरसना बहस को और तेज कर रहा है।
प्रधानमंत्री की कुर्सी गई। संसद में पार्टी की पुरानी ताकत नहीं रही। खुद ओली समेत 78 सांसदों ने अपनी सीट गंवाई और एमाले 25 सीटों पर सिमट गई। बालकोट का घर भी नहीं बचा। इतना कुछ बदलने के बाद भी आलोचकों का सवाल यही है—क्या ओली का राजनीतिक अंदाज बदला?
अपनी ही पार्टी के आलोचकों पर भड़के ओली
इलाम के कार्यक्रम में ओली ने कहा, “पार्टी कार्यालय की कैंटीन में बैठकर कुछ आवारा लोग मुझे हटाने की बात करते हैं।”
सत्ता पक्ष की आलोचना विपक्षी राजनीति का सामान्य हिस्सा है। लेकिन यहां मामला अलग था। ओली के निशाने पर वे लोग भी थे जो एमाले के भीतर रहकर नेतृत्व बदलने की मांग कर रहे हैं।
ओली का संदेश भी साफ था। उनके मुताबिक जिन्हें पार्टी के मौजूदा नेतृत्व और रास्ते पर भरोसा नहीं है, वे पार्टी छोड़ सकते हैं।
यही वह बात है जिसने एमाले की अंदरूनी राजनीति को फिर गर्म कर दिया है।
वोट नहीं दिया तो एमाले कैसे हुए?
ओली ने पार्टी की सदस्यता और उसके मतदाताओं को लेकर भी सख्त बात कही। उनका तर्क है कि जो चुनाव में एमाले को वोट नहीं देता, उसे एमाले कैसे माना जा सकता है।
इसी आधार पर उन्होंने पार्टी के नेता और कार्यकर्ताओं की संख्या 14 लाख 55 हजार 885 बताई। यह वही संख्या है जो 2082 फागुन के चुनाव में एमाले को समानुपातिक व्यवस्था के तहत मिले मतों से जुड़ती है।
यह सिर्फ आंकड़ों का मामला नहीं है। सवाल पार्टी के भीतर असहमति की जगह का भी है। क्या नेतृत्व की आलोचना करने वाला कार्यकर्ता पार्टी विरोधी हो जाता है? और क्या चुनाव में वोट का फैसला ही किसी व्यक्ति की राजनीतिक पहचान तय करेगा?
एमाले के भीतर अब इसी तरह के सवाल सुनाई दे रहे हैं।
लंबा इतिहास, लेकिन आज पार्टी के सामने अलग संकट
नेपाल की राजनीति में एमाले की अपनी मजबूत विरासत रही है। लोकतांत्रिक आंदोलनों से लेकर 2062/63 के राजनीतिक बदलाव तक पार्टी की भूमिका रही। वृद्ध भत्ते की शुरुआत और 2051 में ‘अपना गांव, खुद बनाएं’ जैसे अभियान भी एमाले की राजनीतिक पहचान का हिस्सा रहे हैं।
पार्टी को मदन भंडारी जैसा नेता मिला, जिन्होंने जनताको बहुदलीय जनवाद यानी जबज को एमाले की वैचारिक राजनीति के केंद्र में स्थापित किया।
इसी इतिहास के कारण आज का संकट ज्यादा बड़ा दिखता है।
मुद्दा केवल यह नहीं कि एमाले चुनाव हार गई। बड़ा सवाल यह है कि इतनी पुरानी पार्टी के भीतर नेतृत्व पर खुलकर बहस करने की गुंजाइश कितनी बची है।
जेन्जी आंदोलन के बाद बदल गई पूरी राजनीति
ओली के आलोचक मौजूदा राजनीतिक हालात की बड़ी जिम्मेदारी उनके पिछले कार्यकाल पर डालते हैं।
जेन्जी आंदोलन से पहले ओली सरकार के सोशल मीडिया बंद करने के फैसले ने युवाओं में पहले से मौजूद नाराजगी को और बढ़ाया। इसके बाद शुरू हुए आंदोलन ने देश की राजनीति की दिशा ही बदल दी।
23 भदौ के आंदोलन में हिंसा और घुसपैठ के खतरे को समय रहते पहचानने में राज्य तंत्र की नाकामी पर भी सवाल उठे। आलोचना यह भी हुई कि हालात बिगड़ने के बाद ओली ने समय पर राजनीतिक फैसला नहीं लिया।
इसके बाद जो हुआ, उसने सत्ता का पूरा समीकरण बदल दिया।
रास्वपा 182 सीटों के साथ बड़ी ताकत बनकर सामने आई, जबकि 78 सीटों वाली एमाले 25 सीटों तक गिर गई। इस बदलाव को केवल एक चुनावी हार के रूप में देखना मुश्किल है। यह पुरानी और नई राजनीति के बीच मतदाताओं के बदलते भरोसे का संकेत भी है।
ओली की राजनीति का विरोध करने वालों का तर्क है कि अगर उस समय सरकार ने सोशल मीडिया बंद करने जैसा फैसला नहीं लिया होता और आंदोलन को संभालने में राजनीतिक संवेदनशीलता दिखाई होती, तो हालात शायद इतने नहीं बिगड़ते।
यह एक राजनीतिक आकलन है, लेकिन एमाले के भीतर भी अब इसकी चर्चा से बचना आसान नहीं है।
नई सरकार पर भी पुराने अंदाज में हमला
इलाम पहुंचे ओली ने रास्वपा सरकार को भी निशाने पर लिया। उन्होंने कटाक्ष किया कि जिसे बजाना नहीं आता, उसके हाथ में मादल देने से अच्छा संगीत नहीं निकलता।
ओली ने यहां तक कहा कि अब देश चलाने की जिम्मेदारी फिर उनकी पार्टी को संभालनी पड़ेगी।
चुनावी हार के बाद भी उनके भाषण में आत्मविश्वास की कमी नहीं दिखी। लेकिन इसी आत्मविश्वास को आलोचक अहंकार के तौर पर देख रहे हैं।
यहीं एमाले के सामने असली राजनीतिक मुश्किल खड़ी होती है।
अगर नेतृत्व चुनावी हार के कारणों पर सवाल उठाने वालों को ही पार्टी से बाहर जाने को कहेगा, तो सुधार की शुरुआत कहां से होगी?
नेतृत्व बदलने की मांग पहले से उठती रही है
एमाले में ओली के विकल्प की चर्चा नई नहीं है। जेन्जी आंदोलन के बाद यह आवाज और मजबूत हुई थी।
हालांकि बाद में हुए महाधिवेशन में महेश बस्नेत समेत ओली समर्थक नेताओं की सक्रियता के बीच ओली फिर अध्यक्ष बने। इसके बाद नेतृत्व के खिलाफ उठने वाली आवाजें धीरे-धीरे कमजोर पड़ती गईं।
अब चुनावी नतीजों ने उसी बहस को फिर सामने ला दिया है।
पार्टी के सामने सवाल सिर्फ ओली को अध्यक्ष बनाए रखने या हटाने का नहीं है। सवाल यह भी है कि एमाले आने वाले वर्षों में कैसी पार्टी बनेगी—एक व्यक्ति के नेतृत्व के आसपास घूमने वाली या अपने पुराने संगठन, विचार और आंतरिक बहस की संस्कृति को फिर मजबूत करने वाली।
प्रधानमंत्री पद गया। संसदीय ताकत घटी। सत्ता हाथ से निकली। पार्टी के कई बड़े नेता चुनाव हार गए।
लेकिन ओली की भाषा और राजनीतिक तेवर अब भी पुराने ही हैं।
रास्वपा के लिए यह स्थिति राजनीतिक रूप से फायदेमंद साबित हो सकती है। मगर एमाले के उन कार्यकर्ताओं के लिए, जो पार्टी के इतिहास और विचार से जुड़े हैं, यही सबसे बड़ी चिंता है।
अब देखना यह है कि चुनावी हार के बाद एमाले अपने भीतर बदलाव की जगह बनाती है या नेतृत्व की आलोचना करने वालों को किनारे लगाने का सिलसिला आगे भी जारी रहता है।
DISCLAIMER
यह सामग्री AI की सहायता से अनुवादित की गई है, लेकिन प्रकाशन से पूर्व इसकी संपादकीय समीक्षा और तथ्यात्मक सत्यापन किया गया है।