जब पत्रकार पत्रकार नहीं रह जाते, जब सामाजिक अभियानों से जुड़े लोग सवालों से ऊपर उठा दिए जाते हैं, और जब नेताओं को जनता का प्रतिनिधि नहीं बल्कि किसी मसीहा की तरह देखा जाने लगता है, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है।
नेपाल लंबे समय से इसी समस्या से जूझ रहा है।
कोई पत्रकार थोड़ा तेज बोल दे तो लोग उसे सच का आखिरी चेहरा मानने लगते हैं। कोई अभियंता या सामाजिक कार्यकर्ता कुछ मदद जुटा ले तो उसके खिलाफ सवाल करना भी गलत माना जाने लगता है। कोई नेता एक-दो अच्छे काम कर दे तो उसके समर्थक उसे देश बचाने वाला घोषित कर देते हैं।
फिर वहां नागरिक नहीं बचते, सिर्फ भक्त बचते हैं।
और जहां भक्त पैदा होते हैं, वहां जवाबदेही खत्म होने लगती है।
जिस नेता को नेता की तरह देखा जाता है, उससे सवाल किए जा सकते हैं। जनता उसकी आलोचना कर सकती है। चुनाव में उसे हरा सकती है। मीडिया उसके फैसलों पर दबाव बना सकता है।
लेकिन जब वही नेता “अछूत” बना दिया जाता है, तब आलोचना को दुश्मनी समझा जाने लगता है।
यहीं से लोकतंत्र कमजोर पड़ता है।
नेपाल में बार-बार यही हुआ है। हर कुछ साल में एक नया चेहरा आता है। लोग उसमें उम्मीद देखने लगते हैं। समर्थक हर बात का बचाव करने लगते हैं। सवाल पूछने वालों को विरोधी कहा जाता है। फिर धीरे-धीरे वही उम्मीद टूटती है और जनता फिर निराश हो जाती है।
समस्या सिर्फ नेताओं की नहीं है। समस्या उस राजनीतिक संस्कृति की भी है जहां लोग व्यक्तियों को संस्थाओं से बड़ा बना देते हैं।
लोकतंत्र भक्तों से नहीं चलता
दुनिया के कई मजबूत लोकतंत्रों में नेता को सिर्फ जनता का प्रतिनिधि माना जाता है, कोई देवता नहीं।
नॉर्वे इसका बड़ा उदाहरण है। वहां मंत्री गलती करे तो मीडिया खुलकर सवाल पूछता है। जनता आलोचना करती है। जरूरत पड़े तो इस्तीफा भी देना पड़ता है।
लोग नेताओं को बचाने नहीं निकलते, बल्कि उनसे जवाब मांगते हैं।
इसी वजह से वहां व्यवस्था व्यक्ति से बड़ी बनी रहती है।
फिनलैंड में भी राजनीति का आधार व्यक्तिपूजा नहीं बल्कि पारदर्शिता, शिक्षा और संस्थागत भरोसा है। वहां प्रधानमंत्री सड़क पर निकल जाए तो लोग उसे किसी असाधारण व्यक्ति की तरह नहीं देखते।
वह भी बाकी नागरिकों की तरह जवाबदेह माना जाता है।
स्वीडन में भी यही संस्कृति दिखती है। सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन व्यवस्था चलती रहती है क्योंकि जनता नेताओं को अस्थायी जिम्मेदारी निभाने वाला प्रतिनिधि मानती है।
वहां सिस्टम बड़ा है, व्यक्ति नहीं।
जब नेता भगवान बन जाते हैं
इतिहास इसका उल्टा पक्ष भी दिखाता है।
उत्तर कोरिया में शासक परिवार को दशकों तक लगभग भगवान की तरह पेश किया गया। सवाल पूछना खतरे की बात बन गया। आलोचना गायब हो गई।
आज वहां सत्ता मजबूत है, लेकिन आम लोगों की स्वतंत्रता बेहद सीमित है।
इराक में सद्दाम हुसैन के दौर में भी पूरा राजनीतिक ढांचा एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमने लगा था। तस्वीरें, भाषण और प्रचार ही राजनीति बन गए थे।
धीरे-धीरे संस्थाएं कमजोर पड़ती गईं।
अंत में देश युद्ध, अस्थिरता और तबाही में धंस गया।
लीबिया में मुअम्मर गद्दाफी के समय भी यही हुआ। शुरू में लोगों ने उन्हें उम्मीद की तरह देखा, लेकिन बाद में आलोचना के लिए जगह ही खत्म हो गई। विरोध को दुश्मनी माना जाने लगा।
फिर देश लंबे संघर्ष और अस्थिरता में फंस गया।
ये अलग-अलग देश हैं, लेकिन इन सबमें एक बात समान दिखती है — जहां नागरिक सवाल पूछना छोड़ देते हैं और नेताओं की पूजा करने लगते हैं, वहां लोकतंत्र कमजोर होने लगता है।
नेपाल के सामने अब भी मौका है
नेपाल की मौजूदा राजनीतिक निराशा सिर्फ नेताओं की वजह से पैदा नहीं हुई। जनता भी बार-बार व्यक्तियों में भावनात्मक उम्मीद लगाती रही है।
फिर वही चक्र दोहराया जाता है।
एक नेता से निराशा होती है, दूसरा चेहरा सामने आता है, उसके समर्थक उसे बचाने लगते हैं, सवाल कम हो जाते हैं और जवाबदेही फिर कमजोर पड़ जाती है।
लोकतंत्र ऐसे नहीं चलता।
पत्रकार को पत्रकार रहने देना होगा। सामाजिक कार्यकर्ता को कार्यकर्ता रहने देना होगा। नेता को नेता रहने देना होगा।
किसी को भी सवालों से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
एक स्वस्थ लोकतंत्र को भक्त नहीं, जागरूक नागरिक चाहिए होते हैं। ऐसे नागरिक जो सवाल पूछ सकें, असहमति जता सकें, आलोचना कर सकें और जरूरत पड़े तो सत्ता बदल सकें।
जिस दिन लोग यह छोड़ देते हैं, उसी दिन लोकतंत्र कमजोर पड़ना शुरू हो जाता है।