नेपाल-भारत सीमा को लेकर प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह की टिप्पणी पर शुरू हुआ राजनीतिक विवाद अभी थमता नहीं दिख रहा है। संसद में लगातार विरोध के बीच सरकार ने साफ किया है कि यदि आवश्यकता पड़ी तो प्रधानमंत्री दोबारा प्रतिनिधि सभा में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने के लिए तैयार हैं।
मंत्रिपरिषद की बैठक के बाद सरकार के प्रवक्ता और शिक्षा मंत्री सस्मित पोखरेल ने कहा कि सरकार संसद के सवालों से बचने वाली नहीं है। उनका कहना था कि प्रधानमंत्री सदन के प्रति जवाबदेह हैं और उठे हुए मुद्दों पर स्पष्टीकरण देने से पीछे नहीं हटेंगे।
विवाद उस वक्त शुरू हुआ जब प्रधानमंत्री शाह ने संसद में नेपाल-भारत सीमा के विषय पर बोलते हुए कहा था कि प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें कुछ ऐसे तथ्य भी पता चले हैं जिनकी जानकारी पहले नहीं थी। इसी दौरान उन्होंने यह संकेत दिया था कि संभव है नेपाल भी भारत के कुछ हिस्सों का उपयोग कर रहा हो। उनके इस बयान के बाद विपक्षी दलों ने कड़ा विरोध शुरू कर दिया।
विपक्ष की क्या मांग है?
विपक्षी दल प्रधानमंत्री की टिप्पणी को गंभीर विषय बता रहे हैं। उनका कहना है कि सीमा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर दिए गए बयान को लेकर प्रधानमंत्री को संसद में विस्तृत जवाब देना चाहिए।
विपक्ष की मुख्य मांगें हैं:
- प्रधानमंत्री सदन में आकर अतिरिक्त स्पष्टीकरण दें।
- विवादित माने जा रहे बयान को संसदीय अभिलेख से हटाया जाए।
- सीमा संबंधी विषयों पर सरकार अपनी आधिकारिक स्थिति स्पष्ट करे।
इन्हीं मांगों को लेकर विपक्ष लगातार संसद की कार्यवाही में बाधा डाल रहा है, जिससे नियमित कामकाज प्रभावित हो रहा है।
सरकार का पक्ष
सरकार का कहना है कि प्रधानमंत्री ने कोई नया दावा नहीं किया था। प्रवक्ता पोखरेल के अनुसार उन्होंने केवल उन जानकारियों का उल्लेख किया था जो वर्षों से सीमा संबंधी तकनीकी और कूटनीतिक तंत्रों में चर्चा का हिस्सा रही हैं।
सरकार का मानना है कि सीमा विवाद का समाधान राजनीतिक नारों या आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि स्थापित कूटनीतिक प्रक्रियाओं के जरिए होना चाहिए।
पोखरेल ने कहा कि नेपाल और भारत दोनों देशों के बीच सीमा से जुड़े मामलों पर औपचारिक संवाद की व्यवस्था पहले से मौजूद है और शेष विवादित मुद्दों पर भी बातचीत जारी है।
संसद में गतिरोध जारी
सरकार और विपक्ष के बीच इस मुद्दे पर फिलहाल सहमति बनती नहीं दिख रही है। विपक्ष अपने रुख पर कायम है, जबकि सरकार का कहना है कि प्रधानमंत्री पहले भी संसद में जवाब दे चुके हैं और जरूरत पड़ने पर फिर से सदन में उपस्थित होंगे।
सीमा से जुड़ा यह मामला अब केवल एक बयान का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि संसद के कामकाज और सरकार-विपक्ष के टकराव का नया केंद्र बन गया है। सरकार लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों को तथ्य, संवाद और कूटनीतिक प्रक्रिया के आधार पर ही आगे बढ़ाया जाना चाहिए।