सीमा मुद्दे पर घिरे प्रधानमंत्री शाह, संसद में विपक्ष का दबाव बढ़ा

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नेपाल-भारत सीमा को लेकर प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के एक बयान पर संसद में विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। विपक्षी दलों के साथ-साथ छोटे दलों ने भी अब प्रधानमंत्री से सीधे सदन में आकर स्थिति स्पष्ट करने की मांग उठाई है।

सोमवार को प्रतिनिधिसभा की बैठक में इस मुद्दे को लेकर फिर तीखी बहस हुई। श्रम संस्कृति पार्टी के अध्यक्ष और सांसद हर्क साम्पाङ ने कहा कि सीमा जैसे संवेदनशील विषय पर प्रधानमंत्री की ओर से दिया गया बयान खुद उन्हीं को स्पष्ट करना चाहिए। उनका कहना था कि इस टिप्पणी से लोगों के बीच भ्रम की स्थिति बनी है और सरकार को साफ जवाब देना चाहिए।

साम्पाङ ने सीमा सुरक्षा को राष्ट्रीय महत्व का विषय बताते हुए नेपाली सेना की भूमिका को भी मजबूत बनाने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सीमा की निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाया जाना चाहिए।

विपक्ष का दबाव बरकरार

प्रतिनिधिसभा की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर विरोध दर्ज कराया। इसके बाद बोलते हुए नेकपा एमाले की उपनेता पद्मा अर्याल ने प्रधानमंत्री की टिप्पणी को कूटनीतिक दृष्टि से अनुचित बताया।

अर्याल का कहना था कि देश की सीमा और संप्रभुता से जुड़े मामलों पर प्रधानमंत्री के बयान को सामान्य गलती मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। उन्होंने दोहराया कि प्रधानमंत्री को सार्वजनिक रूप से अपना बयान वापस लेकर माफी मांगनी चाहिए।

उन्होंने यह भी याद दिलाया कि अतिक्रमित क्षेत्रों को शामिल करते हुए नया राष्ट्रीय नक्शा जारी किए जाने के समय सभी प्रमुख राजनीतिक दल एक साझा राष्ट्रीय रुख पर सहमत हुए थे। ऐसे मुद्दों को दलगत राजनीति से ऊपर रखकर देखने की जरूरत है।

हर्क साम्पाङ ने मांगा तथ्यात्मक जवाब

संसद में अपनी बात रखते हुए हर्क साम्पाङ ने प्रधानमंत्री की चुप्पी पर भी सवाल उठाया। उनका कहना था कि कई दिनों से यह मुद्दा संसद में उठ रहा है, लेकिन सरकार की ओर से कोई औपचारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।

उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि यदि यह दावा किया गया है कि नेपाल ने भी कहीं भारतीय भूमि पर अतिक्रमण किया है, तो सरकार को उसका स्पष्ट विवरण और तथ्य सार्वजनिक करने चाहिए। यदि ऐसा नहीं है तो प्रधानमंत्री को अपने बयान पर पुनर्विचार कर जनता के सामने स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

विवाद की जड़ प्रधानमंत्री शाह का वह बयान है जो उन्होंने जेठ 17 को प्रतिनिधिसभा में दिया था। उस दौरान उन्होंने कहा था कि नेपाल और भारत के बीच सीमा विवाद का समाधान संवाद और कूटनीतिक माध्यमों से होना चाहिए।

इसी क्रम में उन्होंने यह भी कहा था कि प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें जानकारी मिली कि केवल भारत ही नहीं, बल्कि कुछ स्थानों पर नेपाल ने भी भारतीय भूमि का अतिक्रमण किया है।

यही टिप्पणी विपक्ष के निशाने पर आ गई। नेकपा एमाले शुरू से ही इस बयान का विरोध कर रही है। पार्टी का कहना है कि जब तक प्रधानमंत्री अपनी बात स्पष्ट नहीं करते और सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगते, तब तक संसद के भीतर उनका विरोध जारी रहेगा।

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यह सामग्री AI की सहायता से अनुवादित की गई है, लेकिन प्रकाशन से पूर्व इसकी संपादकीय समीक्षा और तथ्यात्मक सत्यापन किया गया है।

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