गणतंत्र दिवस के अवसर पर पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने लोकतांत्रिक गणतंत्र नेपाल की रक्षा, लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत बनाने और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए सभी पक्षों को जिम्मेदार बनने का आह्वान किया है। सोशल मीडिया के माध्यम से शुभकामना संदेश जारी करते हुए उन्होंने लिखा:
“आज से ठीक अठारह वर्ष पहले हम नेपाली नागरिकों ने स्वयं निर्वाचित संविधान सभा के माध्यम से गणतंत्र की घोषणा की थी। यह हमारे इतिहास का एक महत्वपूर्ण दिन है।
जनता को अपने लिए स्वयं शासन व्यवस्था तय करने का लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त करने के लिए सात दशक से अधिक लंबा संघर्ष करना पड़ा। बोलने, लिखने, संगठित होने और राजनीतिक विचार व्यक्त करने के अधिकार के लिए हजारों अग्रजों ने अपना जीवन बलिदान किया। अनेक लोगों ने वर्षों तक जेल, यातना और निर्वासन भी झेला।
जनता के बड़े संघर्ष और बलिदान के बाद आदेश से चलने वाली व्यवस्था समाप्त हुई और कानून से चलने वाली प्रणाली स्थापित हुई। किसी एक व्यक्ति की इच्छा से चलने वाले शासन की जगह लोकतांत्रिक संस्थाओं और संरचनाओं द्वारा संचालित व्यवस्था शुरू हुई।
जनता की आज़ादी की इस व्यवस्था की स्थापना के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले अमर शहीदों और अग्रजों के प्रति मैं भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।
लंबे समय से गणतांत्रिक व्यवस्था का अभ्यास कर रहे देशों की तुलना में नेपाल ने अभी अपेक्षाकृत कम समय तक ही इसका अनुभव किया है। इतने कम समय में लोकतांत्रिक संस्कृति, संस्थागत ढाँचे और जनता की सेवा करने की क्षमता विकसित करना आसान नहीं होता। फिर भी इस अवधि में सामाजिक और भौतिक विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है।
गणतंत्र केवल शासन व्यवस्था में बदलाव नहीं था, बल्कि यह नेपाली समाज की चेतना में आया एक गहरा परिवर्तन भी था। सदियों तक ‘प्रजा’ के रूप में जीवन बिताने वाला समाज अपने ही बनाए संविधान के माध्यम से सार्वभौम नागरिक में परिवर्तित हुआ। इस नई व्यवस्था में परिपक्वता आने में समय लगता है और हमने भी यही अनुभव किया है।
आज गाँव-गाँव तक पहुँची स्थानीय सरकार, राज्य के संसाधनों का विस्तार, महिलाओं, दलितों, जनजातियों, मधेशियों और पिछड़े समुदायों की बढ़ती भागीदारी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, नागरिक अधिकार, डिजिटल सेवाओं तक पहुँच, सड़कों और संचार का विस्तार—ये सभी परिवर्तन अचानक नहीं आए हैं। ये गणतंत्र की उपलब्धियाँ हैं।
हालाँकि परिवर्तन की गति उतनी तेज़ नहीं रही जितनी हम चाहते थे। परिवर्तन की रफ्तार सामाजिक चेतना पर भी निर्भर करती है। अपेक्षित गति से बदलाव न होने पर व्यवस्था के प्रति असंतोष होना स्वाभाविक है, लेकिन उन असंतोषों का समाधान भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर ही संभव है। इसलिए इस व्यवस्था की रक्षा करना आवश्यक है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था और लोकप्रिय नारों के बीच का अंतर समाज धीरे-धीरे अपने अनुभवों से समझता है। जनता की निराशा का लाभ उठाकर संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करना और भावनाओं को भड़काकर लोकतांत्रिक ढाँचे को कमजोर करने की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक अधिकारों को कमजोर कर सकती है तथा अधिनायकवाद को बढ़ावा दे सकती है।
संविधान, संसद, न्यायपालिका और स्वतंत्र प्रेस की स्वायत्तता और सुरक्षा ही आज हमारे गणतंत्र की रक्षा का आधार है। लोकतांत्रिक गणतंत्र न रहने पर क्या-क्या खोना पड़ सकता है, इसका अनुभव हमारी पिछली पीढ़ियों ने किया है।
यदि लोकतंत्र की ये संस्थाएँ कमजोर होती हैं तो कोई भी समाज मजबूत नहीं रह सकता और जनता भी सुख-समृद्धि प्राप्त नहीं कर सकती। इसलिए लोकतांत्रिक गणतंत्र की इन संस्थाओं की रक्षा करना हम सभी के भविष्य की रक्षा करना है।
गणतंत्र दिवस के इस पावन अवसर पर मैं सभी से आग्रह करता हूँ कि भावनाओं में बहने के बजाय शांत मन से लोकतंत्र की स्थापना के लिए किए गए संघर्षों को याद करें और इस बात पर विचार करें कि यदि लोकतंत्र कमजोर हुआ तो हमारा भविष्य कैसा होगा।
सभी दिदी-बहनों तथा भाइयों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।”