रास्वपा में बढ़ते विवादों ने खड़े किए नए सवाल

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कुछ समय पहले तक पुरानी पार्टियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच पद, जिम्मेदारी और संगठनात्मक शक्ति को लेकर होने वाले विवाद अक्सर चर्चा में रहते थे। ऐसे मामलों को लेकर नई राजनीति की बात करने वाले लोग भी लगातार आलोचना करते थे।

लेकिन अब राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) खुद इसी तरह के विवादों के कारण सुर्खियों में है। पर्सा, सुनसरी और बारा में हाल के दिनों में सामने आए घटनाक्रमों ने पार्टी की आंतरिक स्थिति को लेकर बहस तेज कर दी है।

पर्सा अधिवेशन से पहले हुआ विवाद

पर्सा जिले में होने वाले पार्टी अधिवेशन से पहले प्रतिनिधि चयन को लेकर असहमति बढ़ गई। वीरगंज में अधिवेशन की तैयारी के दौरान एक पक्ष ने प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कार्यक्रम रोकने की मांग की।

विवाद बढ़ते-बढ़ते झड़प में बदल गया। होटल परिसर से शुरू हुआ तनाव बाहर सड़क तक पहुंच गया। कार्यकर्ताओं के बीच हाथापाई हुई और हेलमेट से मारपीट तक की नौबत आ गई।

इस घटना में महादेव प्रसाद कुर्मी, गौतम श्रेष्ठ सहित तीन लोग घायल हुए।

सुनसरी में भी सामने आई नाराजगी

पर्सा की घटना के तुरंत बाद सुनसरी जिले में आयोजित प्रथम जिला अधिवेशन के दौरान भी विवाद देखने को मिला।

कुछ युवाओं ने आरोप लगाया कि उन्हें प्रतिनिधि सूची से बाहर कर दिया गया है। इसी मुद्दे पर वे कार्यक्रम स्थल पर धरने पर बैठ गए।

बाद में जब अधिवेशन की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की कोशिश हुई तो दोनों पक्षों के बीच तनाव पैदा हो गया। इस घटना ने भी संगठन के भीतर मौजूद असंतोष को सार्वजनिक कर दिया।

बारा में पहले ही दिख चुका था तनाव

कुछ सप्ताह पहले बारा जिले के कलैया में भी पार्टी के दो समूह आमने-सामने आ गए थे।

स्थानीय संगठन के पुराने नेतृत्व से जुड़े कार्यकर्ताओं और एक सांसद समर्थक समूह के बीच तीखी बहस हुई। हालात इतने तनावपूर्ण हो गए कि पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। बाद में चार सांसदों को सुरक्षा व्यवस्था के बीच वहां से निकाला गया।

समर्थकों की चिंता क्यों बढ़ रही है?

रास्वपा को नेपाल की राजनीति में एक वैकल्पिक शक्ति के रूप में देखा गया था। कम समय में पार्टी ने उल्लेखनीय राजनीतिक सफलता हासिल की और बड़ी संख्या में युवाओं का समर्थन भी पाया।

यही वजह है कि जब पार्टी के भीतर लगातार विवाद और गुटीय टकराव की खबरें सामने आ रही हैं तो उसके समर्थकों के बीच निराशा भी दिखाई दे रही है।

कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि जिन प्रवृत्तियों के खिलाफ नई राजनीति का दावा किया गया था, क्या वही समस्याएं अब इस पार्टी के भीतर भी जगह बना रही हैं।

क्या समस्या संगठन की है या राजनीतिक संस्कृति की?

राजनीतिक विश्लेषकों और आम समर्थकों के बीच यह चर्चा भी चल रही है कि केवल पार्टी का नाम बदलने से राजनीतिक व्यवहार नहीं बदलता।

रास्वपा में सक्रिय कई नेता और कार्यकर्ता पहले अन्य स्थापित दलों में राजनीति कर चुके हैं। ऐसे में उन पर पुरानी राजनीतिक शैली, गुटबंदी और पद की प्रतिस्पर्धा को नए मंच पर भी जारी रखने के आरोप लग रहे हैं।

आलोचकों का कहना है कि अवसर मिलने पर दल बदलने वाली राजनीतिक संस्कृति नेपाल की राजनीति में नई नहीं है। इसलिए नई पार्टी बनने भर से पुरानी प्रवृत्तियां स्वतः समाप्त नहीं हो जातीं।

नेतृत्व के सामने बड़ी चुनौती

कांग्रेस, एमाले और माओवादी जैसे दलों में वर्षों से दिखाई देने वाली कई समस्याओं की जड़ आंतरिक गुटबंदी और संगठनात्मक कमजोरी को माना जाता रहा है।

रास्वपा के सामने अब चुनौती यह है कि वह ऐसी प्रवृत्तियों को किस तरह नियंत्रित करती है। यदि समय रहते प्रभावी संगठनात्मक व्यवस्था नहीं बनाई गई तो पार्टी को भी भविष्य में वही कठिनाइयां झेलनी पड़ सकती हैं जिनकी आलोचना वह पहले करती रही है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि केवल नेतृत्व ही नहीं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों को भी संगठन के भीतर गलत प्रवृत्तियों पर सवाल उठाने की संस्कृति विकसित करनी होगी। क्योंकि किसी भी पार्टी की पहचान सिर्फ उसके नारों से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार से तय होती है।

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यह सामग्री AI की सहायता से अनुवादित की गई है, लेकिन प्रकाशन से पूर्व इसकी संपादकीय समीक्षा और तथ्यात्मक सत्यापन किया गया है।

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