राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) के कोशी प्रदेश अधिवेशन के बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर चल रही प्रतिस्पर्धा और असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। प्रदेश अध्यक्ष पद की दौड़ में हार झेलने वाले शरिन तामाङ ने चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए सक्रिय राजनीति से अलग होने की घोषणा कर दी है।
कोशी प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव में चन्द्र राई ने शरिन तामाङ सहित तीन अन्य उम्मीदवारों को पीछे छोड़ते हुए जीत दर्ज की। नतीजे आने के कुछ ही समय बाद तामाङ ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया साझा की और अधिवेशन प्रक्रिया में अनियमितता होने का आरोप लगाया। साथ ही उन्होंने राजनीति में सक्रिय भूमिका न निभाने का फैसला भी सार्वजनिक किया।
पूर्वी नेपाल में रास्वपा के शुरुआती संगठन निर्माण से जुड़े लोगों में शरिन तामाङ का नाम लंबे समय से लिया जाता रहा है। पार्टी की स्थापना के शुरुआती दौर में उन्होंने विभिन्न जिलों में संगठन विस्तार के लिए लगातार काम किया था। स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच उन्हें शुरुआती अभियान के प्रमुख चेहरों में गिना जाता है।
संगठन विस्तार के दौर से नेतृत्व की लड़ाई तक
रास्वपा जब अपने शुरुआती चरण में थी, तब पार्टी नेतृत्व कई राजनीतिक विवादों के बीच घिरा हुआ था। उसी समय नेपाली कांग्रेस, एमाले और माओवादी जैसे स्थापित दलों की मजबूत मौजूदगी के बीच संगठन खड़ा करना आसान नहीं माना जाता था। पूर्वी नेपाल में स्वतंत्र राजनीतिक व्यक्तित्व हर्क साम्पाङ का प्रभाव भी अलग चुनौती माना जाता था।
पार्टी से जुड़े कुछ नेताओं का कहना है कि सीमित संसाधनों के बावजूद तामाङ ने व्यक्तिगत प्रयासों से संगठन विस्तार में काफी समय और मेहनत लगाई थी। यही कारण है कि उनकी राजनीतिक दूरी की घोषणा ने पार्टी के भीतर चर्चा को और तेज कर दिया है।
पुराने और नए चेहरों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा
देशभर में चल रहे रास्वपा के संगठनात्मक अधिवेशनों के दौरान कई जिलों में नेतृत्व चयन को लेकर मतभेद सामने आए हैं। कुछ स्थानों पर विवाद इतना बढ़ा कि अधिवेशन प्रक्रिया को रोकना या स्थगित करना पड़ा।
पार्टी के भीतर यह भी चर्चा है कि शुरुआती दौर से संगठन खड़ा करने वाले कार्यकर्ताओं और हाल के वर्षों में पार्टी में शामिल हुए नेताओं के बीच नेतृत्व को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। कई पुराने कार्यकर्ता महसूस कर रहे हैं कि संगठन निर्माण में उनकी भूमिका के बावजूद उन्हें अपेक्षित स्थान नहीं मिल रहा।
कुछ नेताओं का मानना है कि जेन-जी आन्दोलन के बाद रास्वपा में नए लोगों का प्रवेश तेजी से बढ़ा। इसके साथ ही विभिन्न राजनीतिक दलों से आए नेताओं की सक्रियता भी बढ़ी, जिससे कई जिलों में शक्ति संतुलन का सवाल उभरने लगा।
बालेन और रवि खेमों की चर्चा
पार्टी के भीतर यह चर्चा भी सुनाई देने लगी है कि विभिन्न स्तरों पर नेतृत्व चयन के दौरान अलग-अलग समूह अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ नेताओं ने दावा किया है कि काठमांडू महानगर के मेयर बालेन्द्र शाह (बालेन) और पार्टी सभापति रवि लामिछाने से जुड़े समूहों के बीच भी प्रभाव विस्तार की होड़ देखी जा रही है।
हालांकि पार्टी नेतृत्व ने इस तरह की चर्चाओं पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है और न ही किसी गुटबंदी की पुष्टि की है।
उधर, बालेन शाह के निकट माने जाने वाले तथा वर्तमान महामंत्री भूपदेव शाह कई जिलों में संगठन निर्माण और अधिवेशन प्रबंधन से जुड़े कार्यक्रमों में सक्रिय दिखाई दिए हैं। इससे पार्टी के भीतर नए और पुराने समूहों के समीकरणों पर भी चर्चा तेज हुई है।
नेतृत्व के सामने नई चुनौती
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी राजनीतिक दल के विस्तार के साथ नेतृत्व और प्रभाव की प्रतिस्पर्धा बढ़ना स्वाभाविक प्रक्रिया है। संगठन जितना बड़ा होता है, उतनी ही अधिक महत्वाकांक्षाएं और दावेदार सामने आते हैं।
रास्वपा के मामले में भी कोशी अधिवेशन के बाद सामने आए विवाद को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। लेकिन चुनौती केवल प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं है। पार्टी नेतृत्व के सामने अब यह सवाल भी है कि सार्वजनिक रूप से उठे आरोपों, असंतोष और संगठनात्मक मतभेदों को किस तरह संभाला जाए।
शरिन तामाङ द्वारा लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हो सकी है। पार्टी नेतृत्व की ओर से भी इस विषय पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि कोशी प्रदेश अधिवेशन के बाद रास्वपा के भीतर चल रही राजनीतिक हलचल ने संगठन की आंतरिक स्थिति पर नई बहस शुरू कर दी है। आने वाले दिनों में नेतृत्व इन मतभेदों को किस तरह संभालता है, इस पर पार्टी की संगठनात्मक एकता और भविष्य की दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी।